तब देखी मुद्रिका मनोहर।
राम नाम अंकित अति सुंदर।।
चकित चितव मुदरी पहिचानी।
हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।
जीति को सकइ अजय रघुराई।
माया तें असि रचि नहिं जाई।।
माया तें असि रचि नहिं जाई।।
सीता मन बिचार कर नाना।
मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।
रामचंद्र गुन बरनैं लागा।
सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।
सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।
लागीं सुनैं श्रवण मन लाई।
आदिहु तें सब कथा सुनाई।।
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई।
कहि सो प्रगट होति किन भाई।।
कहि सो प्रगट होति किन भाई।।
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ।
फिरि बैंठीं मन विस्मय भयऊ।।
राम दूत मैं मातु जानकी।
सत्य शपथ करुनानिधान की।।
सत्य शपथ करुनानिधान की।।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी।
दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।
नर बानरहि संग कहु कैसें।
कहि कथा भइ संगति जैसें।।
कहि कथा भइ संगति जैसें।।
भक्त कवि तुलसीदास रचित रामचरित-मानस से
क्रमशः जारी ...

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