Hindi poetry : पथरा गयीं आँखे इस पथ को तकते तकते - Ranjan Kumar - Ranjan Kumar Dil ❤ Se - Poetry and Works of Ranjan Kumar

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Wednesday, February 06, 2019

Hindi poetry : पथरा गयीं आँखे इस पथ को तकते तकते - Ranjan Kumar




पथरा गयीं आँखे 
इस पथ को तकते तकते ,
तुम फिर नहीं आए कभी 
यहाँ बरसों से !

तेरे वादों की पोटली थी 
जो मेरी धरोहर है ,
गुम हुयी है यहीं कहीं 
तलाश में अब तक हूँ !

मेरे लिए तो वक़्त ठहरा है वहीं
जहाँ पे हम बिछड़े थे ,
देखता रहता हूँ ,
दीवारें तक भी न क्यूँ महफूज रहीं !



नहीं सुनता कोई मेरी ,
मैं सबसे कहता हूँ ,
ये दौर कौन सा है 
क्यों हर चेहरा ही अनजाना है ?

वक़्त आगे बढ़ गया क्या बहुत ज्यादा 
मैं ठहरा रह गया इस बस्ती में ?
वो नाराज होंगे नहीं आते इधर ,
क्यों कोई पहचान वाला भी नहीं दिखता है ?

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